Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 10.34 / 42

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)10.34

10.34
मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम् । कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा ॥ १०-३४ ॥
mṛtyuḥ sarvaharaścāhamudbhavaśca bhaviṣyatām | kīrtiḥ śrīrvākca nārīṇāṃ smṛtirmedhā dhṛtiḥ kṣamā || 10-34 ||
— मैं सबका हरण करने वाली मृत्यु ; — और होने वाली वस्तुओं का उद्गम ; — स्त्रीवाचक गुणों में कीर्ति, श्री, वाणी ; — स्मृति, मेधा, धृति, क्षमा

मैं सबका हरण करने वाली मृत्यु हूँ, और होने वाली वस्तुओं का उद्गम हूँ; स्त्रीवाचक गुणों में कीर्ति, श्री, वाणी, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा हूँ।