Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 10.33 / 42

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)10.33

10.33
अक्षराणामकारोऽस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च । अहमेवाक्षयः कालो धाताऽहं विश्वतोमुखः ॥ १०-३३ ॥
akṣarāṇāmakāro'smi dvandvaḥ sāmāsikasya ca | ahamevākṣayaḥ kālo dhātā'haṃ viśvatomukhaḥ || 10-33 ||
— अक्षरों में 'अ' कार हूँ ; — और समासों में द्वन्द्व ; — मैं ही अक्षय काल ; — विश्वतोमुख धाता हूँ

अक्षरों में मैं 'अ' कार हूँ, और समासों में द्वन्द्व-समास हूँ; मैं ही अक्षय काल हूँ, और विश्वतोमुख धाता हूँ।