Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 10.35 / 42

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)10.35

10.35
बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम् । मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः ॥ १०-३५ ॥
bṛhatsāma tathā sāmnāṃ gāyatrī chandasāmaham | māsānāṃ mārgaśīrṣo'hamṛtūnāṃ kusumākaraḥ || 10-35 ||
— सामों में बृहत्साम वैसे ही ; — छन्दों में गायत्री हूँ ; — महीनों में मार्गशीर्ष हूँ ; — ऋतुओं में पुष्पों से भरी (वसन्त)

सामों में बृहत्साम हूँ, छन्दों में गायत्री हूँ; महीनों में मार्गशीर्ष हूँ, और ऋतुओं में पुष्पों से भरी (वसन्त) हूँ।