Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 1.23 / 47

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)1.23

1.23
योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः । धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः ॥ १-२३ ॥
yotsyamānānavekṣe'haṃ ya ete'tra samāgatāḥ | dhārtarāṣṭrasya durbuddheryuddhe priyacikīrṣavaḥ || 1-23 ||
— लड़ने को उद्यत ; — मैं देख लूँ ; — जो यहाँ एकत्र हुए हैं ; — दुर्बुद्धि धृतराष्ट्रपुत्र (दुर्योधन) का ; — युद्ध में प्रिय करने की इच्छा वाले

मैं उन लड़ने को आए हुओं को देख लूँ जो यहाँ एकत्र हुए हैं, जो दुर्बुद्धि धृतराष्ट्रपुत्र (दुर्योधन) का युद्ध में प्रिय करने की इच्छा रखते हैं।