परेश प्रभो सर्वरूपाप्रकाशिन् अनिर्द्देश्य सर्वेन्द्रियागम्य सत्य ।
अचिन्त्याक्षर व्यापकाव्यक्त तत्त्व जगद्भासकाधीश पायादपायात् ॥६२॥
pareśa prabho sarvarūpāprakāśin anirddeśya sarvendriyāgamya satya |
acintyākṣara vyāpakāvyakta tattva jagadbhāsakādhīśa pāyādapāyāt ||62||
हे परेश, हे प्रभो, समस्त रूपों को प्रकाशित करने वाले (पर स्वयं अप्रकाश), अनिर्देश्य, समस्त इन्द्रियों से अगम्य, हे सत्य, हे अचिन्त्य-अक्षर, व्यापक-अव्यक्त तत्त्व, जगत् को भासित करने वाले अधीश — वह (हमें) विनाश से बचाए।