The Great Liberation Tantra· 3.62 / 153

The Great Liberation Tantra3.62

3.62
परेश प्रभो सर्वरूपाप्रकाशिन् अनिर्द्देश्य सर्वेन्द्रियागम्य सत्य । अचिन्त्याक्षर व्यापकाव्यक्त तत्त्व जगद्भासकाधीश पायादपायात् ॥६२॥
pareśa prabho sarvarūpāprakāśin anirddeśya sarvendriyāgamya satya | acintyākṣara vyāpakāvyakta tattva jagadbhāsakādhīśa pāyādapāyāt ||62||
— हे परेश ; — हे प्रभो ; — हे समस्त रूपों को प्रकाशित करने वाले (पर स्वयं अप्रकाश) ; — हे अनिर्देश्य ; — हे समस्त इन्द्रियों से अगम्य ; — हे सत्य ; — हे अचिन्त्य-अक्षर ; — हे व्यापक-अव्यक्त ; — हे तत्त्व ; — हे जगत् को भासित करने वाले अधीश ; — रक्षा करे ; — विनाश से

हे परेश, हे प्रभो, समस्त रूपों को प्रकाशित करने वाले (पर स्वयं अप्रकाश), अनिर्देश्य, समस्त इन्द्रियों से अगम्य, हे सत्य, हे अचिन्त्य-अक्षर, व्यापक-अव्यक्त तत्त्व, जगत् को भासित करने वाले अधीश — वह (हमें) विनाश से बचाए।