The Great Liberation Tantra· 2.1 / 54

The Great Liberation Tantra2.1

2.1
इति देव्या वचः शृत्वा शङ्करो लोकशङ्करः । कथयामास तत्त्वेन महाकारुण्यवारिधिः ॥१॥
iti devyā vacaḥ śṛtvā śaṅkaro lokaśaṅkaraḥ | kathayāmāsa tattvena mahākāruṇyavāridhiḥ ||1||
— इस प्रकार ; — देवी के ; — वचन को ; — सुनकर ; — शंकर ; — लोक का कल्याण करने वाले ; — कहा, उपदेश किया ; — यथार्थ रूप से ; — महाकरुणा के सागर

इस प्रकार देवी के वचन सुनकर, लोक का कल्याण करने वाले, महाकरुणा के सागर शंकर ने यथार्थ रूप से (तत्त्व का) उपदेश किया।