The Great Liberation Tantra· 2.2 / 54

The Great Liberation Tantra2.2

2.2
श्रीसदाशिव उवाच । साधु पृष्टं महाभागे जगतां हितकारिणि । एतादृशः शुभः प्रश्नो न केनापि कृतः पुरा ॥२॥
śrīsadāśiva uvāca | sādhu pṛṣṭaṃ mahābhāge jagatāṃ hitakāriṇi | etādṛśaḥ śubhaḥ praśno na kenāpi kṛtaḥ purā ||2||
— श्रीसदाशिव ने कहा ; — अच्छा, भली प्रकार ; — पूछा गया ; — हे महाभागे ; — जगत् के ; — हे हितकारिणी ; — ऐसा ; — शुभ ; — प्रश्न ; — नहीं ; — किसी के द्वारा भी ; — किया गया ; — पहले

श्रीसदाशिव ने कहा — हे महाभागे, हे जगत् के हितकारिणी, तुमने अच्छा पूछा; ऐसा शुभ प्रश्न पहले किसी ने नहीं किया।