The Great Liberation Tantra· 2.3 / 54

The Great Liberation Tantra2.3

2.3
धन्याऽसि सुकृतज्ञाऽसि हिताऽसि कलिजन्मनाम् । यद्यदुक्तं त्वया भद्रे सत्यं सत्यं यथार्थतः ॥३॥
dhanyā'si sukṛtajñā'si hitā'si kalijanmanām | yadyaduktaṃ tvayā bhadre satyaṃ satyaṃ yathārthataḥ ||3||
— धन्य ; — तुम हो ; — सुकृत को जानने वाली ; — तुम हो ; — हितकारिणी ; — तुम हो ; — कलियुग में जन्मे प्राणियों की ; — जो-जो ; — कहा गया ; — तुम्हारे द्वारा ; — हे भद्रे ; — सत्य ; — सत्य ही सत्य ; — यथार्थतः

तुम धन्य हो, सुकृत को जानने वाली हो, और कलियुग में जन्मे प्राणियों की हितकारिणी हो; हे भद्रे, तुमने जो-जो कहा है, वह सत्य है, यथार्थतः सत्य ही सत्य है।