The Great Liberation Tantra· 1.72 / 72

The Great Liberation Tantra1.72

1.72
कर्तव्यं यदकर्तव्यं वर्णाश्रमविभेदतः । विना त्वां सर्वलोकानां कस्त्राता भुवनत्रये ॥७२॥
kartavyaṃ yadakartavyaṃ varṇāśramavibhedataḥ | vinā tvāṃ sarvalokānāṃ kastrātā bhuvanatraye ||72||
— करने योग्य ; — जो ; — न करने योग्य ; — वर्ण और आश्रम के भेद के अनुसार ; — बिना ; — तुम्हें ; — समस्त लोकों का ; — कौन ; — त्राता, रक्षक ; — तीनों भुवनों में

वर्ण और आश्रम के भेद के अनुसार क्या करना चाहिए और क्या नहीं — यह (बतलाने वाला) आपके बिना तीनों भुवनों में समस्त लोकों का त्राता और कौन है?