The Great Liberation Tantra· 1.71 / 72

The Great Liberation Tantra1.71

1.71
ब्रह्मज्ञा ब्रह्मविद्याश्च ब्रह्मचिन्तनमानसाः । सिद्ध्यर्थं लोकयात्रायाः कथयस्व हिताय यत् ॥७१॥
brahmajñā brahmavidyāśca brahmacintanamānasāḥ | siddhyarthaṃ lokayātrāyāḥ kathayasva hitāya yat ||71||
— ब्रह्मज्ञ ; — ब्रह्मविद्या से सम्पन्न ; — और ; — ब्रह्म के चिन्तन में लीन-मन ; — सिद्धि के लिए ; — लोक-यात्रा की ; — कहो ; — हित के लिए ; — जो योग्य हो

(जिससे वे) ब्रह्मज्ञ, ब्रह्मविद्या से सम्पन्न, और ब्रह्म के चिन्तन में लीन-मन हों — लोक-यात्रा की सिद्धि के लिए, उनके हित के जो योग्य हो, वह कहिए।