The Great Liberation Tantra· 1.56 / 72

The Great Liberation Tantra1.56

1.56
कलिकल्मषयुक्तानां सर्वदाऽस्थिरचेतसाम् । निद्रालस्यप्रसक्तानां भावशुद्धिः कथं भवेत् ॥५६॥
kalikalmaṣayuktānāṃ sarvadā'sthiracetasām | nidrālasyaprasaktānāṃ bhāvaśuddhiḥ kathaṃ bhavet ||56||
— कलि के कल्मष से युक्तों का ; — सदा अस्थिर-चित्तों का ; — निद्रा और आलस्य में आसक्तों का ; — भाव-शुद्धि ; — कैसे ; — हो

कलि के कल्मष से युक्त, सदा अस्थिर-चित्त, निद्रा और आलस्य में आसक्त — उनकी भाव-शुद्धि भला कैसे हो?