The Great Liberation Tantra· 1.55 / 72

The Great Liberation Tantra1.55

1.55
दिव्यश्च देवताप्रायः शुद्धान्तःकरणः सदा । द्वन्द्वातीतो वीतरागः सर्वभूतसमः क्षमी ॥५५॥
divyaśca devatāprāyaḥ śuddhāntaḥkaraṇaḥ sadā | dvandvātīto vītarāgaḥ sarvabhūtasamaḥ kṣamī ||55||
— दिव्य ; — और ; — प्रायः देवता के समान ; — शुद्ध अन्तःकरण वाला ; — सदा ; — द्वन्द्व से अतीत ; — वीतराग ; — सब प्राणियों के प्रति सम ; — क्षमाशील

और दिव्य प्रायः देवता के समान, सदा शुद्ध-अन्तःकरण, द्वन्द्व से अतीत, वीतराग, सब प्राणियों के प्रति सम, और क्षमाशील होता है।