The Great Liberation Tantra· 1.54 / 72

The Great Liberation Tantra1.54

1.54
पत्रं पुष्पं फलं तोयं स्वयमेवाहरेत् पशुः । न शूद्रदर्शनं कुर्ययात् मनसा न स्त्रियं स्मरेत् ॥५४॥
patraṃ puṣpaṃ phalaṃ toyaṃ svayamevāharet paśuḥ | na śūdradarśanaṃ kuryayāt manasā na striyaṃ smaret ||54||
— पत्र ; — पुष्प ; — फल ; — जल ; — स्वयं ही ; — लाए ; — पशु ; — नहीं ; — शूद्र का दर्शन ; — करे ; — मन से ; — नहीं ; — स्त्री को ; — स्मरण करे

पशु को पत्र, पुष्प, फल और जल स्वयं ही लाना चाहिए; उसे शूद्र का दर्शन नहीं करना चाहिए, और न मन से (विधि के समय) स्त्री का स्मरण करना चाहिए।