The Great Liberation Tantra· 1.53 / 72

The Great Liberation Tantra1.53

1.53
पशुभावदिव्यभावौ स्वयमेव निवारितौ । कलौ न पशुभावोऽस्ति दिव्यभावः कुतो भवेत् ॥५३॥
paśubhāvadivyabhāvau svayameva nivāritau | kalau na paśubhāvo'sti divyabhāvaḥ kuto bhavet ||53||
— पशुभाव और दिव्यभाव ; — स्वयं ही ; — निवारित किए गए ; — कलियुग में ; — नहीं ; — पशुभाव ; — है ; — दिव्यभाव ; — कहाँ से ; — हो

पशुभाव और दिव्यभाव — दोनों को आपने स्वयं ही निवारित कर दिया; कलियुग में पशुभाव नहीं रहता, तो दिव्यभाव कहाँ से हो सकता है?