The Great Liberation Tantra· 1.16 / 72

The Great Liberation Tantra1.16

1.16
मम रूपाऽसि देवि त्वं न भेदोऽस्ति त्वया मम । सर्वज्ञा किं न जानासि त्वनभिज्ञेव पृच्छसि ॥१६॥
mama rūpā'si devi tvaṃ na bhedo'sti tvayā mama | sarvajñā kiṃ na jānāsi tvanabhijñeva pṛcchasi ||16||
— मेरा ; — रूप ; — तुम हो ; — हे देवि ; — तुम ; — नहीं ; — भेद ; — है ; — तुमसे ; — मेरा ; — सर्वज्ञा ; — क्या, क्यों ; — नहीं ; — जानती हो ; — अनभिज्ञ-सी ; — मानो ; — पूछती हो

हे देवि, तुम मेरा ही रूप हो; तुममें और मुझमें कोई भेद नहीं है। तुम सर्वज्ञ हो — क्या नहीं जानती? फिर भी अनभिज्ञ-सी होकर पूछ रही हो।