The Great Liberation Tantra· 1.17 / 72

The Great Liberation Tantra1.17

1.17
इति देववचः शृत्वा पार्वती हृष्टमानसा । विनयावनता साध्वी परिपप्रच्छ शङ्करम् ॥१७॥
iti devavacaḥ śṛtvā pārvatī hṛṣṭamānasā | vinayāvanatā sādhvī paripapraccha śaṅkaram ||17||
— इस प्रकार ; — देव के वचन को ; — सुनकर ; — पार्वती ; — हृष्ट-मन वाली ; — विनय से अवनत ; — साध्वी ; — भलीभाँति पूछा ; — शंकर से

देव के इस वचन को सुनकर हृष्ट-मन वाली, विनय से अवनत, साध्वी पार्वती ने शंकर से पूछा।