The Great Liberation Tantra1.17
इति देववचः शृत्वा पार्वती हृष्टमानसा ।
विनयावनता साध्वी परिपप्रच्छ शङ्करम् ॥१७॥
iti devavacaḥ śṛtvā pārvatī hṛṣṭamānasā |
vinayāvanatā sādhvī paripapraccha śaṅkaram ||17||
— इस प्रकार ; — देव के वचन को ; — सुनकर ; — पार्वती ; — हृष्ट-मन वाली ; — विनय से अवनत ; — साध्वी ; — भलीभाँति पूछा ; — शंकर से देव के इस वचन को सुनकर हृष्ट-मन वाली, विनय से अवनत, साध्वी पार्वती ने शंकर से पूछा।