The Great Liberation Tantra1.15
तवाग्रे कथयिष्यामि सुगोप्यमपि यद्भवेत् ।
किमस्ति त्रिषु लोकेषु गोपनीयं तवाग्रतः ॥१५॥
tavāgre kathayiṣyāmi sugopyamapi yadbhavet |
kimasti triṣu lokeṣu gopanīyaṃ tavāgrataḥ ||15||
— तुम्हारे समक्ष ; — कहूँगा ; — अत्यन्त गोपनीय को ; — भी ; — जो भी हो ; — क्या ; — है ; — तीनों में ; — लोकों में ; — गोपनीय, छिपाने योग्य ; — तुम्हारे समक्ष वह भी, चाहे कितना ही गोपनीय हो, मैं तुम्हारे समक्ष कहूँगा। तीनों लोकों में तुमसे छिपाने योग्य भला क्या है?