— मृदु आसन पर (अधिकरण — समासगत); — एक स्फिच् (नितम्ब) पर — करण कारक (असम बैठना); — हाथ-पैर को निराधार (कर्म + विशेषण — समासगत); — रखकर (क्त्वान्त); — उस प्रसंग से (अपादान — समासगत); — परा-पूर्णा मति (पूर्ण-बोध) उत्पन्न होती है — कर्ता + विधि लिङ्
मृदु आसन पर एक स्फिच् (नितम्ब) पर बैठकर, हाथ-पैर को निराधार रखकर — उस प्रसंग (उस अवस्था के विषय) से परा-पूर्णा मति (सर्वोच्च पूर्ण-बोध) हो जाती है। (धारणा ९०)