Vijñāna Bhairava Tantra · 1.113

Vijñāna Bhairava Tantra 1.113

1.113
मृद्वासने स्फिजैकेन हस्तपादौ निराश्रयौ । निधाय तत्प्रसङ्गेन परा पूर्णा मतिर्भवेत् ॥११३॥
mṛdvāsane sphijaikena hastapādau nirāśrayau | nidhāya tatprasaṅgena parā pūrṇā matir bhavet
anuṣṭubh
— मृदु आसन पर (अधिकरण — समासगत) ; — एक स्फिच् (नितम्ब) पर — करण कारक (असम बैठना) ; — हाथ-पैर को निराधार (कर्म + विशेषण — समासगत) ; — रखकर (क्त्वान्त) ; — उस प्रसंग से (अपादान — समासगत) ; — परा-पूर्णा मति (पूर्ण-बोध) उत्पन्न होती है — कर्ता + विधि लिङ्

मृदु आसन पर एक स्फिच् (नितम्ब) पर बैठकर, हाथ-पैर को निराधार रखकर — उस प्रसंग (उस अवस्था के विषय) से परा-पूर्णा मति (सर्वोच्च पूर्ण-बोध) हो जाती है। (धारणा ९०)