Vijñāna Bhairava Tantra 1.112
करङ्किण्या क्रोधनया भैरव्या लेलिहानया ।
खेचर्या दृष्टिकाले च परावाप्तिः प्रकाशते ॥११२॥
karaṅkiṇyā krodhanayā bhairavyā lelihānayā |
khecaryā dṛṣṭikāle ca parāvāptiḥ prakāśate
anuṣṭubh
— करङ्किणी (मुद्रा) से (करण कारक) ; — क्रोधना (मुद्रा) से (करण कारक) ; — भैरवी (मुद्रा) से (करण कारक) ; — लेलिहाना (मुद्रा) से (करण कारक) ; — खेचरी (मुद्रा) से (करण कारक) ; — दृष्टि-काल में (अधिकरण — समासगत) ; — और (अव्यय) ; — परम-प्राप्ति, परा-अवाप्ति (कर्ता कारक — समासगत) ; — प्रकाशित होती है (वर्तमान काल) करङ्किणी, क्रोधना, भैरवी, लेलिहाना और खेचरी — इन (मुद्राओं की) दृष्टि-काल में पर-अवाप्ति (परम-प्राप्ति) प्रकाशित होती है। (धारणा ८९)