Vijñāna Bhairava Tantra · 1.111

Vijñāna Bhairava Tantra 1.111

1.111
तेजसा सूर्यदीपादेराकाशे शबलीकृते । दृष्टे स्वात्मनि भायुक्ते सच्चिदानन्दगोचरः ॥१११॥
tejasā sūryadīpāder ākāśe śabalīkṛte | dṛṣṭe svātmani bhāyukte saccidānandagocaraḥ
anuṣṭubh
— तेज से, प्रकाश से (करण कारक) ; — सूर्य, दीपक आदि का (षष्ठी — समासगत) ; — आकाश के शबल (चित्र-विचित्र) हो जाने पर (सति-सप्तमी) ; — अपने आत्मा के दर्शन होने पर (सति-सप्तमी) ; — उस प्रकाश से युक्त (समासगत विशेषण) ; — सत्-चित्-आनन्द का गोचर (अनुभव) — कर्ता कारक — समासगत

सूर्य, दीपक आदि के तेज से जब आकाश शबल (चित्र-विचित्र, रंगीन) हो जाए, और उसी प्रकाश से युक्त अपने आत्मा का दर्शन हो — (तब) सत्-चित्-आनन्द का गोचर (अनुभव) प्रकट होता है। (धारणा ८८)