— तेज से, प्रकाश से (करण कारक); — सूर्य, दीपक आदि का (षष्ठी — समासगत); — आकाश के शबल (चित्र-विचित्र) हो जाने पर (सति-सप्तमी); — अपने आत्मा के दर्शन होने पर (सति-सप्तमी); — उस प्रकाश से युक्त (समासगत विशेषण); — सत्-चित्-आनन्द का गोचर (अनुभव) — कर्ता कारक — समासगत
सूर्य, दीपक आदि के तेज से जब आकाश शबल (चित्र-विचित्र, रंगीन) हो जाए, और उसी प्रकाश से युक्त अपने आत्मा का दर्शन हो — (तब) सत्-चित्-आनन्द का गोचर (अनुभव) प्रकट होता है। (धारणा ८८)