— निद्रा के अभी न आने पर (सति-सप्तमी); — बाह्य गोचर के नष्ट होने पर (सति-सप्तमी — समासगत); — वह अवस्था (कर्ता कारक); — मन से प्राप्य, मन से पहुँचने योग्य (करण + विशेषण); — परा देवी प्रकाशित होती है (कर्ता + वर्तमान काल)
जब निद्रा अभी न आई हो, और बाह्य गोचर (विषय-जगत्) नष्ट (विलीन) हो गया हो — उस अवस्था में मन से (पहुँचने योग्य) परा देवी प्रकाशित होती है। (धारणा ८७)