Vijñāna Bhairava Tantra 1.109
यत्र यत्रात्मनस्तुष्टिर्मनस्तत्रैव धारयेत् ।
तत्र तत्र परानन्दस्वरूपं सम्प्रवर्तते ॥१०९॥
yatra yatrātmanas tuṣṭir manas tatraiva dhārayet |
tatra tatra parānandasvarūpaṃ sampravartate
anuṣṭubh
— जहाँ-जहाँ (अव्यय-युग्म) ; — आत्मा की तुष्टि (हो) — षष्ठी + कर्ता ; — मन (कर्म कारक) ; — वहीं ही (अव्यय-युग्म) ; — धारण करे, रखे (विधि लिङ्) ; — वहाँ-वहाँ (अव्यय-युग्म) ; — परम आनन्द का स्वरूप (कर्ता कारक — समासगत) ; — पूर्णतः प्रवर्तित होता है (वर्तमान काल) जहाँ-जहाँ आत्मा की तुष्टि हो, वहीं मन को धारण करे; वहाँ-वहाँ परम आनन्द का स्वरूप पूर्णतः प्रवर्तित होता है। (धारणा ८६)