Vijñāna Bhairava Tantra · 1.108

Vijñāna Bhairava Tantra 1.108

1.108
गीतादिविषयास्वादासमसौख्यैकतात्मनः । योगिनस्तन्मयत्वेन मनोरूढेस्तदात्मता ॥१०८॥
gītādiviṣayāsvādāsamasaukhyaikatātmanaḥ | yoginas tanmayatvena manorūḍhes tadātmatā
anuṣṭubh
— गीत आदि विषयों के आस्वाद से उत्पन्न असम (अनुपम) सौख्य से एकात्म-स्वरूप वाले (षष्ठी — समासगत) ; — योगी के लिए (षष्ठी एकवचन) ; — तन्मयत्व के द्वारा (करण कारक) ; — मन की रूढ़ि (अधिरोहण) से (अपादान — समासगत) ; — तदात्मता, परम के साथ एकात्म्य (कर्ता कारक — समासगत)

गीत आदि विषयों के आस्वाद से उत्पन्न असम (अनुपम) सौख्य से एकात्म-रूप योगी के लिए — तन्मयत्व के द्वारा मन की रूढ़ि (अधिरोहण) से तदात्मता (परम तत्त्व के साथ एकात्म्य) हो जाती है। (धारणा ८५)