जग्धिपानकृतोल्लासरसानन्दविजृम्भणात् ।
भावयेद्भरितावस्थां महानन्दस्ततो भवेत् ॥१०७॥
jagdhipānakṛtollāsarasānandavijṛmbhaṇāt |
bhāvayed bharitāvasthāṃ mahānandas tato bhavet
anuṣṭubh
खाने-पीने से किए हुए उल्लास के रस-आनन्द के विजृम्भण (विस्तार) से भरितावस्था (पूर्णता-स्थिति) की भावना करे — उससे महान् आनन्द उत्पन्न होता है। (धारणा ८४)