Vijñāna Bhairava Tantra · 1.107

Vijñāna Bhairava Tantra 1.107

1.107
जग्धिपानकृतोल्लासरसानन्दविजृम्भणात् । भावयेद्भरितावस्थां महानन्दस्ततो भवेत् ॥१०७॥
jagdhipānakṛtollāsarasānandavijṛmbhaṇāt | bhāvayed bharitāvasthāṃ mahānandas tato bhavet
anuṣṭubh
— खाना-पीना (कर्ता कारक — समासगत) ; — रस-आनन्द के विस्तार से (अपादान — समासगत) ; — महान् आनन्द (कर्ता — समासगत)

खाने-पीने से किए हुए उल्लास के रस-आनन्द के विजृम्भण (विस्तार) से भरितावस्था (पूर्णता-स्थिति) की भावना करे — उससे महान् आनन्द उत्पन्न होता है। (धारणा ८४)