Vijñāna Bhairava Tantra · 1.106

Vijñāna Bhairava Tantra 1.106

1.106
आनन्दे महति प्राप्ते दृष्टे वा बान्धवे चिरात् । आनन्दमुद्गतं ध्यात्वा तल्लयस्तन्मना भवेत् ॥१०६॥
ānande mahati prāpte dṛṣṭe vā bāndhave cirāt | ānandam udgataṃ dhyātvā tallayas tanmanā bhavet
anuṣṭubh
— महान् आनन्द प्राप्त होने पर (अधिकरण + विशेषण + सति-सप्तमी) ; — बहुत समय बाद बान्धव (के देखने पर) — अधिकरण + अव्यय ; — तल्लीन, उसमें लीन (कर्ता — समासगत)

महान् आनन्द प्राप्त होने पर, अथवा बहुत समय बाद बान्धव (प्रियजन) के देखने पर — उद्गत (उठते हुए) आनन्द का ध्यान करके (साधक) तल्लीन, तन्मय हो जाता है। (धारणा ८३)