लेहनामन्थनाकोटैः स्त्रीसुखस्य भरात्स्मृतेः ।
शक्त्यभावेऽपि देवेशि भवेदानन्दसम्प्लवः ॥१०५॥
lehanāmanthanākoṭaiḥ strīsukhasya bharāt smṛteḥ |
śaktyabhāve'pi deveśi bhaved ānandasamplavaḥ
anuṣṭubh
हे देवेशि! लेहन (जीभ से चाटने), मन्थन और आकोटन (दाब) से स्त्री-सुख के भार के स्मरण से — शक्ति (संगिनी) के अभाव में भी आनन्द का सम्प्लव (बाढ़) उत्पन्न होता है। (धारणा ८२)