Vijñāna Bhairava Tantra · 1.105

Vijñāna Bhairava Tantra 1.105

1.105
लेहनामन्थनाकोटैः स्त्रीसुखस्य भरात्स्मृतेः । शक्त्यभावेऽपि देवेशि भवेदानन्दसम्प्लवः ॥१०५॥
lehanāmanthanākoṭaiḥ strīsukhasya bharāt smṛteḥ | śaktyabhāve'pi deveśi bhaved ānandasamplavaḥ
anuṣṭubh
— लेहन, मन्थन, आकोटन से (करण कारक बहुवचन — समासगत) ; — स्त्री-सुख के भार से (अपादान — समासगत) ; — आनन्द-सम्प्लव, आनन्द की बाढ़ (कर्ता — समासगत)

हे देवेशि! लेहन (जीभ से चाटने), मन्थन और आकोटन (दाब) से स्त्री-सुख के भार के स्मरण से — शक्ति (संगिनी) के अभाव में भी आनन्द का सम्प्लव (बाढ़) उत्पन्न होता है। (धारणा ८२)