Vijñāna Bhairava Tantra · 1.104

Vijñāna Bhairava Tantra 1.104

1.104
कामिनः कामनावेगाद्विस्मयो योगिनां मतः । स्वशरीराह्लादशक्तिर्जायते परमेश्वरी ॥१०४॥
kāminaḥ kāmanāvegād vismayo yogināṃ mataḥ | svaśarīrāhlādaśaktir jāyate parameśvarī
anuṣṭubh
— कामना (इच्छा) के वेग से (अपादान — समासगत) ; — विस्मय, आश्चर्य (कर्ता कारक) ; — अपने शरीर में आह्लाद-शक्ति (कर्ता — समासगत)

कामी पुरुष के काम-वेग से उत्पन्न (जैसा) विस्मय होता है, वैसा ही (विस्मय) योगियों का माना गया है; (तब) अपने शरीर में आह्लाद-शक्ति परमेश्वरी के रूप में उत्पन्न होती है। (धारणा ८१)