Vijñāna Bhairava Tantra · 1.103

Vijñāna Bhairava Tantra 1.103

1.103
तस्मादनुसन्धेयं तत्तदङ्गं विशेषतः । एकत्र ज्ञानं संश्रित्य योगसिद्धिमवाप्नुयात् ॥१०३॥
tasmād anusandheyaṃ tattadaṅgaṃ viśeṣataḥ | ekatra jñānaṃ saṃśritya yogasiddhim avāpnuyāt
anuṣṭubh
— अनुसन्धान योग्य, विचारणीय (विधेय विशेषण) ; — एक (बिन्दु पर) ज्ञान का आश्रय लेकर (अधिकरण + कर्म + क्त्वान्त) ; — योग-सिद्धि (कर्म कारक — समासगत)

इसलिए प्रत्येक अंग का विशेष रूप से अनुसन्धान करना चाहिए; एक (बिन्दु पर) ज्ञान का आश्रय लेकर (साधक) योग-सिद्धि प्राप्त करता है।