Vijñāna Bhairava Tantra · 1.102

Vijñāna Bhairava Tantra 1.102

1.102
मन्त्रार्थप्रोक्तरूपाणि अधिकारिविशेषतः । तानि साधयते कश्चित्साधयन्साधको भवेत् ॥१०२॥
mantrārthaproktarūpāṇi adhikāriviśeṣataḥ | tāni sādhayate kaścit sādhayan sādhako bhavet
anuṣṭubh
— मन्त्रों के अर्थ-रूप कहे गए स्वरूप (कर्म कारक बहुवचन — समासगत) ; — अधिकारी (साधक) की विशेषता के अनुसार (अपादान — समासगत) ; — (सफलतापूर्वक) सिद्ध करता हुआ साधक (हो जाता है) — कर्ता कारक

मन्त्रों के अर्थ के रूप में जो (विशिष्ट) रूप कहे गए हैं, वे अधिकारी (साधक) की विशेषता के अनुसार (होते हैं); कोई उन्हें सिद्ध करता है — सिद्ध करता हुआ साधक हो जाता है।