Vijñāna Bhairava Tantra · 1.114

Vijñāna Bhairava Tantra 1.114

1.114
उपविश्यासने सम्यग्बाहू कृत्वार्धकुञ्चितौ । कक्षव्योम्नि मनः कुर्वन्शममायाति तल्लयात् ॥११४॥
upaviśyāsane samyag bāhū kṛtvārdhakuñcitau | kakṣavyomni manaḥ kurvan śamam āyāti tallayāt
anuṣṭubh
— अर्ध-कुञ्चित दो बाहु (कर्म द्विवचन) ; — कक्ष (काँख) के व्योम में (अधिकरण — समासगत) ; — उसके लय से (अपादान — समासगत)

[पुनरुक्ति — श्लोक ९६] आसन पर बैठकर बाहुओं को अर्ध-कुञ्चित करके, काँख के व्योम में मन को लगाकर — उसके लय से शान्ति को प्राप्त होता है।