उपविश्यासने सम्यग्बाहू कृत्वार्धकुञ्चितौ ।
कक्षव्योम्नि मनः कुर्वन्शममायाति तल्लयात् ॥११४॥
upaviśyāsane samyag bāhū kṛtvārdhakuñcitau |
kakṣavyomni manaḥ kurvan śamam āyāti tallayāt
anuṣṭubh
[पुनरुक्ति — श्लोक ९६] आसन पर बैठकर बाहुओं को अर्ध-कुञ्चित करके, काँख के व्योम में मन को लगाकर — उसके लय से शान्ति को प्राप्त होता है।