The Essence of the Tantra· 8.79 / 93

The Essence of the Tantra8.79

8.79

अन्तः प्राणाश्रयकर्मानुसन्धेस् तु वागिन्द्रियम् तेन इन्द्रियाधिष्ठाने हस्ते यत् गमनं तद् अपि पादेन्द्रियस्यैव कर्म इति मन्तव्यम् तेन कर्मानन्त्यम् अपि न इन्द्रियानन्त्यम् आवहेत् इयति राजसस्य उपश्लेषकत्वम् इत्य् आहुः

Transliteration (IAST)

antaḥ prāṇāśrayakarmānusandhes tu vāgindriyam tena indriyādhiṣṭhāne haste yat gamanaṃ tad api pādendriyasyaiva karma iti mantavyam tena karmānantyam api na indriyānantyam āvahet iyati rājasasya upaśleṣakatvam ity āhuḥ

— प्राण-आश्रित कर्म-अनुसन्धि के लिए ; — वाक्-इन्द्रिय ; — इन्द्रिय-अधिष्ठान हाथ में ; — पाद-इन्द्रिय का कर्म ; — कर्म की अनन्तता ; — इन्द्रिय की अनन्तता ; — राजस (अहङ्कार) का उपश्लेषकत्व (संयोजक-कार्य)

किन्तु अन्तर्, प्राण-आश्रित कर्म-अनुसन्धि के लिए वाक्-इन्द्रिय (है)। अतः इन्द्रिय-अधिष्ठान हाथ में जो गमन है, वह भी पाद-इन्द्रिय का ही कर्म है — ऐसा मन्तव्य है। इस प्रकार कर्म की अनन्तता होने पर भी इन्द्रिय-अनन्तता नहीं आती। इतने में राजस (अहङ्कार) का उपश्लेषकत्व (संयोजक-कार्य) है — ऐसा (आचार्य) कहते हैं।