The Essence of the Tantra· 8.69 / 93

The Essence of the Tantra8.69

8.69

अत एव कार इत्य् अनेन कृतकत्वम् अस्य उक्तं साङ्ख्यस्य तु तत् न युज्यते स हि न आत्मनो ऽहंविमर्शमयताम् इच्छति वयं तु कर्तृत्वम् अपि तस्य इच्छामः

Transliteration (IAST)

ata eva kāra ity anena kṛtakatvam asya uktaṃ sāṅkhyasya tu tat na yujyate sa hi na ātmano 'haṃvimarśamayatām icchati vayaṃ tu kartṛtvam api tasya icchāmaḥ

— 'कार' (अहं-कार में, 'बनाना' अर्थ वाला शब्दांश) ; — कृतकत्व — बनाया हुआ (कार्य) होना ; — सांख्य के लिए ; — अहं-विमर्शमयता — स्व-विमर्शात्मक 'अहम्'-बोध रूपता ; — मानता है, स्वीकार करता है ; — कर्तृत्व ; — हम मानते हैं

इसी कारण 'कार' (अहं-कार में) शब्द से इसका कृतकत्व (बनावटी होना) कहा गया। किन्तु सांख्य के लिए यह युक्त नहीं, क्योंकि वह आत्मा की अहं-विमर्शमयता को नहीं मानता; जबकि हम तो उसका कर्तृत्व भी मानते हैं।