The Essence of the Tantra· 8.70 / 93

The Essence of the Tantra8.70

8.70

तच् च शुद्धं विमर्श एव अप्रतियोगि स्वात्मचमत्काररूपो ऽहम् इति

Transliteration (IAST)

tac ca śuddhaṃ vimarśa eva apratiyogi svātmacamatkārarūpo 'ham iti

— शुद्ध (अहं-विमर्श) ; — विमर्श — स्व-विमर्श, बोधात्मक स्पर्श ; — अप्रतियोगी — प्रतिपक्ष/प्रतियोगी-रहित ; — स्व-आत्म-चमत्कार-रूप ; — अहम् — मैं

और वह शुद्ध (अहं-विमर्श) अप्रतियोगी (प्रतिपक्ष-रहित) विमर्श ही है, स्व-आत्म-चमत्कार-रूप 'अहम्' इस प्रकार।