The Essence of the Tantra· 6.74 / 82

The Essence of the Tantra6.74

6.74

तत्र अर्धप्रहरे अर्धप्रहरे वर्गोदयो विषुवति समः वर्णस्य वर्णस्य द्वे शते षोडशाधिके प्राणानाम् बहिः षट्त्रिंशत् चषकाणि इति उदयः अयम् अयत्नजो वर्णोदयः

Transliteration (IAST)

tatra ardhaprahare ardhaprahare vargodayo viṣuvati samaḥ varṇasya varṇasya dve śate ṣoḍaśādhike prāṇānām bahiḥ ṣaṭtriṃśat caṣakāṇi iti udayaḥ ayam ayatnajo varṇodayaḥ

— प्रत्येक अर्ध-प्रहर में ; — वर्ग-उदय — वर्ण-वर्ग का उदय ; — विषुवत् में समान ; — दो सौ सोलह ; — प्राणों के (श्वासों के) ; — छत्तीस चषक ; — अयत्नज — बिना प्रयत्न के (स्वतःसिद्ध) ; — वर्ण-उदय

उसमें प्रत्येक अर्ध-प्रहर में एक वर्ग-उदय (होता है), विषुवत् में समान; प्रत्येक वर्ण के लिए दो सौ सोलह प्राण, बाहर छत्तीस चषक — यह उदय है। यह अयत्नज (बिना प्रयत्न के) वर्ण-उदय है।