The Essence of the Tantra· 6.26 / 82

The Essence of the Tantra6.26

6.26

तावती एव अहोरात्रे प्राणसङ्ख्या इति न षष्ट्यब्दोदयात् अधिकं परीक्ष्यते आनन्त्यात्

Transliteration (IAST)

tāvatī eva ahorātre prāṇasaṅkhyā iti na ṣaṣṭyabdodayāt adhikaṃ parīkṣyate ānantyāt

— उतनी ही ; — एक अहोरात्र में ; — प्राण-संख्या ; — साठ वर्षों के उदय से ; — अधिक, बढ़कर ; — परीक्षण किया जाता है ; — अनन्तता के कारण

उतनी ही प्राण-संख्या एक अहोरात्र में होती है; अतः साठ वर्षों के उदय से अधिक का परीक्षण नहीं किया जाता, क्योंकि वह अनन्त है।