The Essence of the Tantra· 6.1 / 82

The Essence of the Tantra6.1

6.1

स एव स्थानप्रकल्पनशब्देन उक्तः तत्र त्रिधा स्थानं प्राणवायुः शरीरं बाह्यं च तत्र प्राणे तावत् विधिः सर्वः असौ वक्ष्यमाणः अध्वा प्राणस्थः कल्यते तस्य क्रमाक्रमकलनैव कालः स च परमेश्वर एव अन्तर्भाति तद्भासनं च देवस्य काली नाम शक्तिः भेदेन तु तदाभासनं क्रमाक्रमयोः प्राणवृत्तिः

Transliteration (IAST)

sa eva sthānaprakalpanaśabdena uktaḥ tatra tridhā sthānaṃ prāṇavāyuḥ śarīraṃ bāhyaṃ ca tatra prāṇe tāvat vidhiḥ sarvaḥ asau vakṣyamāṇaḥ adhvā prāṇasthaḥ kalyate tasya kramākramakalanaiva kālaḥ sa ca parameśvara eva antarbhāti tadbhāsanaṃ ca devasya kālī nāma śaktiḥ bhedena tu tadābhāsanaṃ kramākramayoḥ prāṇavṛttiḥ

— 'स्थान-प्रकल्पन' शब्द से ; — तीन प्रकार का ; — स्थान — स्थल ; — प्राण-वायु ; — शरीर ; — बाह्य (जगत्) ; — अध्वा — मार्ग, अभिव्यक्ति का क्रम ; — प्राण में स्थित ; — क्रम-अक्रम की कलना ; — काल ; — परमेश्वर ; — अन्तर्भासित होता है, भीतर समाहित है ; — उसका भासन (प्रकाशन) ; — काली (काल को मापने/ग्रसने वाली शक्ति) ; — शक्ति ; — भेद से, भेदात्मक रूप में ; — प्राण की वृत्ति

वही (करण) 'स्थान-प्रकल्पन' शब्द से कहा गया। उसमें स्थान तीन प्रकार का है — प्राण-वायु, शरीर एवं बाह्य। उनमें पहले प्राण में जो यह समस्त विधि कही जायेगी (उसके अनुसार), अध्वा प्राण में स्थित रूप से कलित (परिगणित) होता है। उसकी क्रम-अक्रम की कलना ही काल है; और वह काल परमेश्वर में ही अन्तर्भासित होता है; और उसका भासन देव की 'काली' नामक शक्ति है; किन्तु भेद से क्रम-अक्रम रूप में उसका आभासन प्राण की वृत्ति है।