The Essence of the Tantra· 3.21 / 34

The Essence of the Tantra3.21

3.21

तत्र अनुत्तरात् कवर्गः श्रद्धायाः इच्छायाः चवर्गः सकर्मिकाया इच्छाया द्वौ टवर्गस् तवर्गश् च उन्मेषात् पवर्गः शक्तिपञ्चकयोगात् पञ्चकत्वम्

Transliteration (IAST)

tatra anuttarāt kavargaḥ śraddhāyāḥ icchāyāḥ cavargaḥ sakarmikāyā icchāyā dvau ṭavargas tavargaś ca unmeṣāt pavargaḥ śaktipañcakayogāt pañcakatvam

— अनुत्तर से क-वर्ग (कण्ठ्य) ; — श्रद्धा/अभिलाषा-रूप इच्छा से च-वर्ग (तालव्य) ; — कर्म-सहित इच्छा से ; — दो — ट-वर्ग (मूर्धन्य) और त-वर्ग (दन्त्य) ; — उन्मेष से प-वर्ग (ओष्ठ्य) ; — शक्ति-पञ्चक के योग के कारण ; — पञ्चकत्व — प्रत्येक वर्ग में पाँच सदस्य

इनमें अनुत्तर से क-वर्ग; श्रद्धा-रूप इच्छा से च-वर्ग; कर्म-सहित इच्छा से दो — ट-वर्ग और त-वर्ग; उन्मेष से प-वर्ग (उत्पन्न होते हैं)। शक्ति-पञ्चक के योग से इनका पञ्चकत्व (प्रत्येक वर्ग में पाँच) है।