The Essence of the Tantra· 3.22 / 34

The Essence of the Tantra3.22

3.22

इच्छाया एव त्रिविधाया य र लाः उन्मेषात् वकारः इच्छाया एव त्रिविधायाः श ष साः विसर्गात् हकारः योनिसंयोगजः क्षकारः

Transliteration (IAST)

icchāyā eva trividhāyā ya ra lāḥ unmeṣāt vakāraḥ icchāyā eva trividhāyāḥ śa ṣa sāḥ visargāt hakāraḥ yonisaṃyogajaḥ kṣakāraḥ

— त्रिविध इच्छा से ; — य, र, ल (अन्तःस्थ) ; — उन्मेष से व-कार ; — श, ष, स (ऊष्म) ; — विसर्ग से ह-कार ; — योनि-संयोग से उत्पन्न क्ष-कार

त्रिविध इच्छा से ही य, र, ल; उन्मेष से व-कार; पुनः त्रिविध इच्छा से ही श, ष, स; विसर्ग से ह-कार; और योनि के संयोग से उत्पन्न क्ष-कार (होते हैं)।