The Essence of the Tantra· 3.13 / 34

The Essence of the Tantra3.13

3.13

तद् एतद् वर्णचतुष्टयम् उभयच्छायाधारित्वात् नपुंसकम् ऋ ॠ ऌ ॡ इति

Transliteration (IAST)

tad etad varṇacatuṣṭayam ubhayacchāyādhāritvāt napuṃsakam ṛ ṝ ḷ ḹ iti

— वर्ण-चतुष्टय — चार वर्णों का समूह (ऋ ॠ ऌ ॡ) ; — दोनों (प्रकाश और विश्रान्ति) की छाया धारण करने के कारण ; — नपुंसक — न पुल्लिंग न स्त्रीलिंग, बन्ध्य

यह वर्ण-चतुष्टय — ऋ, ॠ, ऌ, ॡ — दोनों (प्रकाश और विश्रान्ति) की छाया को धारण करने के कारण नपुंसक (बन्ध्य) है।