The Essence of the Tantra· 3.14 / 34

The Essence of the Tantra3.14

3.14

अनुत्तरानन्दयोः इच्छादिषु यदा प्रसरः तदा वर्णद्वयम् ए ॐ इति

Transliteration (IAST)

anuttarānandayoḥ icchādiṣu yadā prasaraḥ tadā varṇadvayam e oṃ iti

— अनुत्तर और आनन्द का (अ/आ) ; — इच्छा आदि में (इ-श्रेणी में) ; — प्रसर — विस्तार, बहाव ; — वर्ण-द्वय — दो वर्ण (ए, ओ)

जब अनुत्तर और आनन्द का इच्छा आदि में प्रसर होता है, तब 'ए' और 'ओ' — ये दो वर्ण उत्पन्न होते हैं।