The Essence of the Tantra· 3.15 / 34

The Essence of the Tantra3.15

3.15

तत्रापि पुनर् अनुत्तरानन्दसङ्घट्टात् वर्णद्वयम् ऐ औ इति

Transliteration (IAST)

tatrāpi punar anuttarānandasaṅghaṭṭāt varṇadvayam ai au iti

— वहाँ भी पुनः ; — अनुत्तर और आनन्द के सङ्घट्ट (तीव्र मिलन) से ; — वर्ण-द्वय — दो वर्ण (ऐ, औ)

वहाँ भी पुनः अनुत्तर और आनन्द के सङ्घट्ट (तीव्र मिलन) से 'ऐ' और 'औ' — ये दो वर्ण उत्पन्न होते हैं।