The Essence of the Tantra· 22.47 / 53

The Essence of the Tantra22.47

22.47

श्वभ्रे सुदूरे झटिति स्वदेहं सम्पातयन् वासम् असाहसेन । आकुञ्च्य हस्तद्वितयं प्रपश्यन् मुद्राम् इमां व्योमचरीं भजेत

Transliteration (IAST)

śvabhre sudūre jhaṭiti svadehaṃ sampātayan vāsam asāhasena | ākuñcya hastadvitayaṃ prapaśyan mudrām imāṃ vyomacarīṃ bhajeta

— बहुत दूर के श्वभ्र (गर्त) में ; — तत्क्षण अपने देह को गिराता हुआ ; — (अपने) वास को, असाहस से (निर्भयतापूर्वक) ; — दोनों हाथों को आकुञ्चित (सङ्कुचित) करके ; — देखता हुआ — इस व्योमचरी (आकाशगामिनी) मुद्रा का ; — सेवन करे, आश्रय ले

बहुत दूर के श्वभ्र (गर्त) में तत्क्षण अपने देह को — (अपने) वास को — असाहस से (निर्भयतापूर्वक) गिराता हुआ, दोनों हाथों को आकुञ्चित (सङ्कुचित) करके, देखता हुआ — इस व्योमचरी (आकाशगामिनी) मुद्रा का सेवन करे।