श्वभ्रे सुदूरे झटिति स्वदेहं सम्पातयन् वासम् असाहसेन । आकुञ्च्य हस्तद्वितयं प्रपश्यन् मुद्राम् इमां व्योमचरीं भजेत
Transliteration (IAST)
śvabhre sudūre jhaṭiti svadehaṃ sampātayan vāsam asāhasena | ākuñcya hastadvitayaṃ prapaśyan mudrām imāṃ vyomacarīṃ bhajeta
बहुत दूर के श्वभ्र (गर्त) में तत्क्षण अपने देह को — (अपने) वास को — असाहस से (निर्भयतापूर्वक) गिराता हुआ, दोनों हाथों को आकुञ्चित (सङ्कुचित) करके, देखता हुआ — इस व्योमचरी (आकाशगामिनी) मुद्रा का सेवन करे।