The Essence of the Tantra· 20.41 / 65

The Essence of the Tantra20.41

20.41

तत्र आषाढशुक्लात् कुलपूर्णिमादिनान्तं कार्यं पवित्रकम् तत्र कार्त्तिककृष्णपञ्चदशी कुलचक्रं नित्याचक्रं पूरयति इति श्रीनित्यातन्त्रविदः

Transliteration (IAST)

tatra āṣāḍhaśuklāt kulapūrṇimādināntaṃ kāryaṃ pavitrakam tatra kārttikakṛṣṇapañcadaśī kulacakraṃ nityācakraṃ pūrayati iti śrīnityātantravidaḥ

— वहाँ (उस विषय में) ; — आषाढ शुक्ल (पक्ष) से ; — कुल-पूर्णिमा-दिन-पर्यन्त ; — करना चाहिए ; — पवित्रक (पवित्र-सूत्र-अर्पण अनुष्ठान) ; — कार्त्तिक-कृष्ण-पञ्चदशी (अमावस्या) ; — कुल-चक्र (देवता-समूह) ; — नित्या-चक्र (नित्या देवियों का चक्र) ; — पूरित करती है, पूर्ण करती है ; — श्रीनित्यातन्त्र के ज्ञाता (कहते हैं)

वहाँ आषाढ शुक्ल से कुल-पूर्णिमा-दिन-पर्यन्त पवित्रक करना चाहिए; उसमें कार्त्तिक-कृष्ण-पञ्चदशी कुल-चक्र एवं नित्या-चक्र को पूरित करती है — ऐसा श्रीनित्यातन्त्र के ज्ञाता (कहते हैं)।