The Essence of the Tantra· 20.40 / 65

The Essence of the Tantra20.40

20.40

स च श्रीरत्नमालात्रिशिरोमतश्रीसिद्धामतादौ विधिपूर्वकः पारमेश्वराज्ञापूरकश् च उक्तं चैतत् श्रीतन्त्रालोके विना पवित्रकेण सर्वं निष्फलम् इति

Transliteration (IAST)

sa ca śrīratnamālātriśiromataśrīsiddhāmatādau vidhipūrvakaḥ pārameśvarājñāpūrakaś ca uktaṃ caitat śrītantrāloke vinā pavitrakeṇa sarvaṃ niṣphalam iti

— वह (विधि) ; — श्रीरत्नमाला, त्रिशिरोमत, श्रीसिद्धामत आदि में ; — विधिपूर्वक (विहित प्रक्रिया से) ; — पारमेश्वर-आज्ञा-पूरक (प्रभु की आज्ञा को पूर्ण करने वाला) ; — और यह कहा गया है ; — श्री तन्त्रालोक में ; — पवित्रक के बिना ; — सब निष्फल

और वह श्रीरत्नमाला, त्रिशिरोमत, श्रीसिद्धामत आदि में विधिपूर्वक तथा पारमेश्वर-आज्ञा-पूरक (आज्ञा को पूर्ण करने वाला) कहा गया है। और यह श्री तन्त्रालोक में कहा गया है — 'पवित्रक के बिना सब निष्फल है।'