The Essence of the Tantra· 16.2 / 24

The Essence of the Tantra16.2

16.2

तत्र कृतगुरुसेव एव मृत उद्वासितो वा अभिचारादिहतो डिम्बाहतो मृत्युक्षणोदिततथारुचिः मुखान्तरायातशक्तिपातो वा तथा दीक्ष्य इत्य् आज्ञा

Transliteration (IAST)

tatra kṛtaguruseva eva mṛta udvāsito vā abhicārādihato ḍimbāhato mṛtyukṣaṇoditatathāruciḥ mukhāntarāyātaśaktipāto vā tathā dīkṣya ity ājñā

— जिसने गुरु-सेवा की हो ; — मृत — मरा हुआ ; — उद्वासित — अनुष्ठानपूर्वक भेजा गया ; — अभिचार आदि से हत ; — डिम्ब (दंगे/उपद्रव) में हत ; — मृत्यु-क्षण में जिसमें (मुक्ति की) वैसी रुचि उदित हुई ; — अन्य के मुख से (उपदेश से) जिसे आयात शक्तिपात हुआ ; — दीक्ष्य — दीक्षा-योग्य ; — आज्ञा — (शास्त्र का) विधान

वहाँ जिसने गुरु-सेवा की हो और मर गया हो, अथवा उद्वासित (अनुष्ठानपूर्वक भेजा गया) हो, अभिचार आदि से हत हो, डिम्ब (दंगे) में हत हो, मृत्यु-क्षण में जिसमें वैसी रुचि (मुक्ति-इच्छा) उदित हुई हो, अथवा अन्य के मुख से जिसे आयात (प्राप्त) शक्तिपात हुआ हो — वह इस प्रकार दीक्ष्य है, ऐसी आज्ञा है।