The Essence of the Tantra· 16.1 / 24

The Essence of the Tantra16.1

16.1

अथ परोक्षस्य दीक्षा द्विविधश् च सः मृतो जीवंश् च

Transliteration (IAST)

atha parokṣasya dīkṣā dvividhaś ca saḥ mṛto jīvaṃś ca

— परोक्ष (अनुपस्थित, दूरस्थ) की ; — दीक्षा ; — दो प्रकार की ; — मृत ; — जीवित

अब परोक्ष (अनुपस्थित) की दीक्षा; और वह दो प्रकार की है — मृत एवं जीवित।