The Essence of the Tantra· 16.17 / 24

The Essence of the Tantra16.17

16.17

एवम् उद्धृतो ऽसौ पूर्णाहुत्यैव अपवृज्यते यदि स्वर्नरकप्रेततिर्यक्षु स्थितः

Transliteration (IAST)

evam uddhṛto 'sau pūrṇāhutyaiva apavṛjyate yadi svarnarakapretatiryakṣu sthitaḥ

— उद्धृत — उठाया गया, बाहर निकाला गया ; — वह (जीव) ; — पूर्णाहुति से ही ; — अपवृज्य (मुक्त) हो जाता है ; — स्वर्ग, नरक, प्रेत अथवा तिर्यक् (पशु) में ; — स्थित, अवस्थित

इस प्रकार उद्धृत वह (जीव) पूर्णाहुति से ही अपवृज्य (मुक्त) हो जाता है, यदि वह स्वर्ग, नरक, प्रेत अथवा तिर्यक् (पशु) में स्थित रहा हो।