The Essence of the Tantra· 15.1 / 7

The Essence of the Tantra15.1

15.1

यदा पुनर् आसन्नमरणस्य स्वयं वा बन्धुमुखेन शक्तिपात उपजायते तदा अस्मै सद्यः समुत्क्रमणदीक्षां कुर्यात्

Transliteration (IAST)

yadā punar āsannamaraṇasya svayaṃ vā bandhumukhena śaktipāta upajāyate tadā asmai sadyaḥ samutkramaṇadīkṣāṃ kuryāt

— जब पुनः ; — आसन्न-मरण (निकट-मृत्यु) वाले में ; — स्वयं अथवा बन्धु के मुख से ; — शक्तिपात ; — उपजे, उत्पन्न हो ; — तब इसके लिए ; — तत्काल, शीघ्र ; — समुत्क्रमण-दीक्षा (मृत्यु में जीव को बाहर ले जाने वाली दीक्षा) ; — करे

जब पुनः आसन्न-मरण (निकट-मृत्यु) वाले में स्वयं अथवा बन्धु के मुख से शक्तिपात उपजे, तब इसके लिए तत्काल समुत्क्रमण-दीक्षा करे।