The Essence of the Tantra· 15.2 / 7

The Essence of the Tantra15.2

15.2

समस्तम् अध्वानं शिष्ये न्यस्य तं च क्रमेण शोधयित्वा भगवतीं कालरात्रीम् मर्मकर्तनीं न्यस्य तया क्रमात् क्रमं मर्मपाशान् विभिद्य ब्रह्मरन्ध्रवर्ति शिष्यचैतन्यं कुर्यात्

Transliteration (IAST)

samastam adhvānaṃ śiṣye nyasya taṃ ca krameṇa śodhayitvā bhagavatīṃ kālarātrīm marmakartanīṃ nyasya tayā kramāt kramaṃ marmapāśān vibhidya brahmarandhravarti śiṣyacaitanyaṃ kuryāt

— समस्त अध्वा ; — शिष्य में न्यस्त कर ; — उसे क्रमशः शोधित कर ; — भगवती कालरात्री (देवी) ; — मर्म-कर्तनी (मर्मों/मर्म-स्थलों को काटने वाली) ; — न्यस्त कर ; — उससे क्रमशः ; — मर्म-पाशों को विभिन्न (छिन्न) कर ; — ब्रह्म-रन्ध्र में वर्ती (शिर के मुकुट-छिद्र पर स्थित) ; — शिष्य के चैतन्य को करे

समस्त अध्वा को शिष्य में न्यस्त कर, उसे क्रमशः शोधित कर, मर्म-कर्तनी (मर्मों को काटने वाली) भगवती कालरात्री को न्यस्त कर, उससे क्रमशः मर्म-पाशों को विभिन्न (छिन्न) कर, शिष्य के चैतन्य को ब्रह्म-रन्ध्र में वर्ती (स्थित) करे।