The Essence of the Tantra· 13.19 / 101

The Essence of the Tantra13.19

13.19

तत्र चित्प्रकाश एव मध्यं तत इतरप्रविभागप्रवृत्तेः प्रकाशस्वीकार्यम् ऊर्ध्वम् अतथाभूतम् अधः प्रकाशनसम्मुखीनं पूर्वम् इतरत् अपरम् सम्मुखीभूतप्रकाशत्वात् अनन्तरं तत्प्रकाशधारारोहस्थानं दक्षिणम् आनुकूल्यात् तत्सम्मुखं तु अवभास्यत्वात् उत्तरम् इति दिक्चतुष्कम्

Transliteration (IAST)

tatra citprakāśa eva madhyaṃ tata itarapravibhāgapravṛtteḥ prakāśasvīkāryam ūrdhvam atathābhūtam adhaḥ prakāśanasammukhīnaṃ pūrvam itarat aparam sammukhībhūtaprakāśatvāt anantaraṃ tatprakāśadhārārohasthānaṃ dakṣiṇam ānukūlyāt tatsammukhaṃ tu avabhāsyatvāt uttaram iti dikcatuṣkam

— चित्-प्रकाश — चैतन्य का प्रकाश ; — मध्य — केन्द्र ; — उसी से अन्य प्रविभागों की प्रवृत्ति होने के कारण ; — प्रकाश द्वारा स्वीकार्य (ग्रहण करने योग्य) ; — ऊर्ध्व — ऊपर (शिखर) ; — अधः — नीचे (तल) ; — प्रकाशन के सम्मुख — पूर्व दिशा ; — अपर — पश्चिम (इतर) ; — उस प्रकाश की धारा के आरोह का स्थान — दक्षिण ; — आनुकूल्य के कारण ; — केवल अवभास्य होने के कारण — उत्तर ; — दिक्-चतुष्क — चार दिशाओं का समूह

वहाँ चित्-प्रकाश ही मध्य है, क्योंकि उसी से अन्य प्रविभागों की प्रवृत्ति होती है। प्रकाश द्वारा स्वीकार्य ऊर्ध्व है; जो वैसा नहीं, वह अधः है। प्रकाशन के सम्मुख पूर्व है; इतर (अन्य) अपर (पश्चिम) है, क्योंकि वह सम्मुखीभूत प्रकाश वाला है। तदनन्तर उस प्रकाश की धारा के आरोह का स्थान, आनुकूल्य के कारण, दक्षिण है; और उसके सम्मुख, केवल अवभास्य (प्रकाशित होने योग्य) होने के कारण, उत्तर है — यह दिक्-चतुष्क है।